अमृतसर शहर की गलियों में 1919 का वो भयानक दिन आज भी गूंजता है। 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में ब्रिटिश जनरल रेजिनाल्ड डायर ने निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। सैकड़ों मौतें, खून से लथपथ दीवारें और वो कुआं जिसमें लोग छलांग लगा-लगाकर जान बचाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन इस नरसंहार का सबसे गहरा जख्म एक 7 साल के बच्चे पर लगा, जो बाद में उर्दू के सबसे तूफानी लेखक बने – सआदत हसन मंटो!

हां, वही मंटो, जिन्हें हम ‘तमाशा’, ‘बू’, ‘ठंडा गोश्त’ जैसी कहानियों से जानते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बचपन में मंटो जलियांवाला बाग में घंटों अकेले बैठकर अंग्रेजी हुकूमत के तख्तापलट का सपना देखा करते थे? वे कब्रिस्तान घूमते, बेचैन रहते और अपने कमरे को ‘दारुल-अहमर’ (क्रांतिकारी घर) बना लेते थे, जहां भगत सिंह की तस्वीर लगी रहती थी।
मंटो अमृतसर के कूचा वकीलां में पैदा हुए थे। नरसंहार के समय वे सिर्फ 7 साल के थे। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे शहर में गूंज रहे थे। गांधीजी की गिरफ्तारी, सत्यपाल-किचलू की हिरासत और फिर वो खूनी दिन… सबने मंटो को अंदर से हिला दिया। वे खुद लिखते हैं – “मेरा हाल भी उन दिनों दिगर गूं था। जी चाहता था कहीं से पिस्तौल हाथ आ जाए तो एक दहशतगर्द पार्टी बनाई जाए।”
उनकी पहली कहानी ‘तमाशा’ (1934) इसी जख्म से निकली। पुलिस के डर से उन्होंने इसे बिना नाम के छपवाया। कहानी में छोटा खालिद (मंटो का बचपन) सरकार से नफरत करता है। फिर आई ‘स्वराज के लिए’ – जहां उनका दोस्त गुलाम अली स्कूल छोड़कर बाग में क्रांति का भाषण देता है। पूरा बाग तालियों और नारों से दहक उठता है। गांधीजी (बाबाजी) के त्याग पर सवाल उठता है। गुलाम कहता है – “हिंदुस्तान को स्वराज सिर्फ इसलिए नहीं मिल रहा कि यहां मदारी ज्यादा हैं और लीडर कम।”
और ‘1919 की एक बात’ में मंटो ने थैला कंजर (तवायफ की औलाद) को हीरो बनाया। वो बहनों की कमाई से जीता है लेकिन मुल्क की जुल्म सहन नहीं कर पाता। गोरों को मारने का आह्वान करता है और खुद गोली खा लेता है। मंटो ने दिखाया कि क्रांति सिर्फ बड़े-बड़े नेताओं की नहीं, बल्कि आम आदमी, पिछड़ों और गली-कूचों के लोगों की भी थी।
मंटो ने खुद को ‘अव्वल दर्जे का फ्रॉड’ कहा, लेकिन सियासत से उनका रिश्ता गहरा था। वे कहते थे “मंटो को सियासत से कोई दिलचस्पी नहीं”, फिर भी हर राजनीतिक करवट पर उन्होंने कलम उठाई। दंगों में मरने वालों को देखकर वे इंसानियत की याद दिलाते। नेताओं को खटमल कहते, लेकिन आम लोगों को हीरो बनाते।
आज जब हम जलियांवाला बाग की सालगिरह मनाते हैं, तो मंटो की कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि इतिहास सिर्फ तारीखों का नहीं, जख्मों, सपनों और क्रोध का भी होता है। वो 7 साल का बच्चा जो बाग में बैठकर तख्तापलट का सपना देखता था, आज भी लाखों दिलों में जिंदा है।
